menubar

breaking news

Saturday, February 17, 2018

हिन्दुस्तान का मशहूर शायर मुफलिसी के दौर से गुजर रहा

अंजुम यह कह रहा है कोई बात आखिरी... 
जिंदगी बचाने के लिए काटना पड़ेगा पैर
स्वयंसेवी संगठनों, सरकार से लगायी मदद की गुहार
जौनपुर। शेर गोई मेरी आदत है, ऐ अंजुम! बदनसीबी ने मेरे फन को उभरने न दिया, मरने के बाद कब्रा पर आना तुम जरुर, अंजुम यह कह रहा है कोई बात आखिरी... जी हां हम बात कर रहे है हिन्दुस्तान के मशहूर शायरों में से एक अंजुम जौनपुरी की जो इस वक्त अपने मुफलिसी के दौर से गुजर रहे है। हालात इतने खराब हो गये है कि इस शायर के दाहिने पैर को काटने की नौबत तक आ गयी है। बीएचयू के डाक्टरों ने बताया कि पैर की एक नस दब जाने के कारण पैर में इनफेक्शन फैल गया है। इनकी जिंदगी बचाने के लिए पैर का ऑपरेशन कर काटना आवश्यक है और इसमें करीब तीन लाख रुपये का खर्च आएगा। ऐसे में वो अपनी जिंदगी को बचाने के लिए स्वयंसेवी संस्थाओं, सरकार से मदद की उम्मीद लगाये बैठे है।
नगर के अजमेरी मोहल्ले निवासी मुफ्ती मेंहदी हैदर उर्फ अंजुम शायरी की दुनिया में 1972 में बांदा में आयोजित अखिल भारतीय मुशायरे में अपनी गजल पढ़कर रखा था। उनके शेर कितने गहरे है आप इसी से समझ सकते है कि 'गर्दिश के साये कोई रोये, कोई मुस्कुराए, जाने कितनी निगाहें उठी, जब भी गुजरे वह सर झुकाए.." लोगों के दिलों में उतर गयी। फिर क्या था एक के बाद एक 100 से ज्यादा देश-विदेश के मुशायरों में अपनी शायरी के दम पर न सिर्फ उन्होंने मशहूर शायरों के साथ अपना नाम जोड़ा बल्कि अपने उस्ताद कैफ भोपाली से शायरी की दुनिया की सीख ली। इस दौरान फिराक गोरखपुरी, अली सरदार जाफरी, वामिक जौनपुरी, कुमार बाराबंकी व कैफी आजमी जैसे चोटी के शायरों से उनके संबंध जगजाहिर होने लगे। 1981 में वो पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के कराची में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय मुशायरे में भी शामिल हुए थे जहां उनकी गजल के लोग दीवाने हो गये थे। इस दौरान कई एवार्ड से भी नवाजा गया। उन्होंने करबला के शहीदों पर सैकड़ों नौहे भी लिखे है। अंजुम जौनपुरी के दादा मुफ्ती खान बहादुर हैदर हुसैन 1913 से 1938 तक नगर के नगर पालिका परिषद व डिस्टिक बोर्ड के अध्यक्ष रहे। इनके पुत्र मुफ्ती अल्ताफ हैदर परिवहन विभाग में ट्रैफिक सुप्रीटेडेंट के पद पर तैनात थे और 1971 में खुद अंजुम जौनपुरी परिवहन विभाग में टेक्निशियन के पद पर तैनात हुए थे और पूर्वांचल के कई जिलों में उन्होंने अपनी सेवाएं दी लेकिन शायरी से उनका जुड़ाव इतना था कि इन्होंने 2002 में सरकारी नौकरी से त्याग पत्र दे दिया और सिर्फ उर्दू शायरी के लिए ही पूरा वक्त देने लगे। आज वो इस हाल में पहुंच गये है कि अपनी जिंदगी बचाने के लिए उन्हें दूसरों के सहारे की जरुरत पड़ रही है। उनका कहना है कि शायरी उनके जिस्म की रुह है और ये उनके मरने के बाद भी जिंदा रहेगी। उन्होंने अपनी मशहूर गजल 'रुक जाओ सुबह न हो, ये रात आखरी, शायद हो ये जिंदगी के लम्हात आखिरी, मरने के बाद कब्रा पर आना तुम जरुर, अंजुम यह कह रहा है कोई बात आखिरी" कहकर अपनी बात पूरी दुनिया के सामने रख दी। वहीं कांग्रेस के प्रदेश कोआर्डिनेटर अल्पसंख्यक विभाग फैसल हसन तबरेज की टीम ने उनके आवास पर जाकर हाल चाल जाना और इस शायर को जिंदगी बचाने के लिए आर्थिक मदद का आश्वासन दिया है। उन्होंने प्रदेश व केंद्र सरकार से ऐसे शायरों की मदद करने की मांग की है। उनके छोटे भाई मुफ्ती तबस्सुम हैदर भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा में जिला उपाध्यक्ष पद पर तैनात है उन्होंने भी प्रदेश की योगी सरकार से पत्र लिखकर मदद की गुहार लगायी है। 

No comments:

Post a Comment