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Saturday, September 9, 2017

पूर्वांचल विश्वविद्यालय में प्रोफेसर ने अल्ट्रासाउंड की प्रारंभिक जानकारी देते हुए उसके अनुप्रयोगों पर डाला प्रकाश

vijay pratapजौनपुर। वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय में आयोजित ग्रोथ ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी विषयक  कार्यशाला के दूसरे दिन विशेषज्ञों ने परिचर्चा सत्र में अपनी बात रखी। एमएससी के पाठ्यक्रम निर्माण एवं आधारभूत संरचना के विकास पर चर्चा हुई। विश्वेसरैया हाल में इंदिरा गांधी सेंटर फॉर एटानामिक एनर्जी कला पक्कम  के प्रोफेसर पी पलानीचामी  ने अल्ट्रासाउंड की  प्रारंभिक जानकारी देते हुए उसके अनुप्रयोगों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आज के समय अल्ट्रासाउंड आधारित पीजो इलेक्ट्रिक डिवाइस का उपयोग हो रहा है। अल्ट्रासाउंड के द्वारा अनाज के आकार व गुणवत्ता की जांच की जा रही है। पदार्थों का परीक्षण अल्ट्रासाउंड के द्वारा बिना स्वरूप परिवर्तन के संभव हो पाया है। 
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय दिल्ली के प्रोफेसर राजीव कुमार ने शैक्षणिक स्वायत्तता बनाम शिक्षा की गुणवत्ता विषय पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि गुरुकुल की परंपरा में कक्ष व्याख्यान के साथ-साथ विद्यार्थियों के लिए प्रायोगिक ज्ञान भी दिया जाता रहा। गुरुकुल परंपरा में स्वायत्तता  थी। आज स्वायत्तता  को समझने की जरूरत है। स्वायत्तता का तात्पर्य तानाशाही नहीं है। संवैधानिक दायरे में ऐसे उपाय बताए गए हैं जिससे शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता लाई जा सकती है। 
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हरि प्रकाश ने विज्ञान शिक्षा से जुड़ी समस्याओं पर प्रकाश डाला।  उन्होंने कहा कि आज बहुत सारे शिक्षण संस्थाओं में विज्ञान की पढ़ाई तो हो रही है लेकिन प्रयोगशाला  व उपकरणों का अभाव है। विज्ञान विषय इन व्यावहारिक समस्याओं से लंबे समय से जूझ रहा है।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी के पादप विज्ञान विभाग के प्रोफेसर यू पी सिंह ने जैविक खेती के विविध आयामों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि अब सब्जियों के उत्पादन में कीटनाशकों की जगह नीम से निर्मित जैविक  कीटनाशकों का प्रयोग हो रहा है। इससे सब्जियों की गुणवत्ता में वृद्धि हुई है। पर्यावरण की सुरक्षा के लिए प्राकृतिक उत्पादों का उपयोग बड़े पैमाने पर होना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत में कई वनस्पतियों में जैविक खेती को बढ़ावा देने की क्षमता है। ओएनजीसी के पूर्व महाप्रबंधक डॉक्टर पी के मिश्रा ने कहा कि किसी देश के अधोपतन के लिए आइटम बम या महामारी का उतना योगदान नहीं होगा जितना उस देश की शिक्षा व्यवस्था के विनष्ट हो जाने पर। उन्होंने कहा कि उत्पादों के उपभोग के क्षेत्र में भारत एशिया का तीसरा तीसरा सबसे बड़ा देश है जो पेट्रोलियम का उत्पादन व शोध कर रहा है। आने वाले समय में इसका और भी विस्तार होगा। उन्होंने भारत में पेट्रोलियम कंपनियों पर भी अपनी बात रखी।
विज्ञान भारती के प्रदेश अध्यक्ष वाई पी  कोहली ने कहा की परंपरागत ज्ञान- विज्ञान को विज्ञान व तकनीकी के नए शोध कार्यों से जोड़ा जाए। हमें आम आदमी के दहलीज तक हम विज्ञान का प्रकाश लेकर जाना  हैं।  उन्होंने जौनपुर क्षेत्र के मक्के व मूली के उत्पादों के संरक्षण एवं विक्रय को आर्थिक विकास से जोड़कर  अपनी बात रखी। 
आईआईटी  खड़कपुर  के डॉक्टर मेहरवान ने बिना दर्द के इंजेक्शन तकनीक के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि नैनो तकनीकी की सहायता से त्रिआयामी प्रिंटिंग के जरिए मरीजों को दर्द मुक्त तरीके से इंजेक्शन देना संभव हो सका है।  इस क्षेत्र में हम बड़े स्तर पर काम कर रहे हैं। इस अवसर पर डॉक्टर मनोज पटैरिया, डॉक्टर वी ए तभाने , डॉक्टर शबाना शेख, डॉक्टर लोकेंद्र कुमार, डॉक्टर गिरिधर, प्रोफेसर रंजना प्रकाश, प्रोफेसर रामकृपाल, डॉक्टर देवराज सिंह, डॉक्टर शिवाकांत शुक्ला आदि उपस्थित रहे।
कार्यशाला के द्वितीय सत्र में एमएससी भौतिकी ,रसायन एवं गणित विषय के पाठ्यक्रमों पर चर्चा की गई। इसके साथ ही कंप्यूटर  एप्लीकेशन में पीजी डिप्लोमा एवं बीसीए पाठ्यक्रम तैयार करने पर मंथन हुआ। इस सत्र में  प्रोफ़ेसर राम कृपाल,प्रो बलिराम एवं डॉ सत्यदेव ने  अपने विचार रखे ।
तकनीकी सत्र को सबोधित करते हुए विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ पीसी पतंजलि ने कहा कि  विज्ञान एवं तकनीकी को धरातल पर लाये बगैर  विकास की बात बेमानी है। उन्होंने कहा कि क्षेत्र विशेष की भावना का   सम्मान करते हुए पाठ्यक्रम में हिंदी भाषी विद्यार्थियों का ध्यान रखा जाय। उन्होंने समय की मांग को देखते हुए और भी विश्वविद्यालयों की स्थापना पर बल दिया। सत्र की अध्यक्षता लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो आर पी सिंह ने की। कार्यशाला के अध्यक्ष प्रो बीबी तिवारी ने धन्यवाद ज्ञापन किया।
  कार्यशाला की विभिन्न गतिविधियों में डॉ एके  श्रीवास्तव, डॉ राजकुमार, डॉ संतोष कुमार, डॉ मनोज मिश्र, डॉ वीडी शर्मा, डॉ अमरेंद्र सिंह, डॉ दिग्विजय सिंह राठौर, डॉ सुधीर उपाध्याय, डॉ अवध बिहारी सिंह, डॉ रसिकेश, डॉ संजय श्रीवास्तव आदि सक्रिय रहे। 

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