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Monday, August 14, 2017

शहीदों की याद में लगने वाला मेला नेताओं के वर्चस्व की लड़ाई में हो गया बंद


जौनपुर। "शहीदो की चिंताओ पर लगेगें हर बरस मेले यह निशा बाकी होगा" किसी कवि द्वारा लिखी गयी यह लाईने जौनपुर में उल्टी हो गयी है। यहां पर शहीदो की याद में लगने वाला मेला राजनितिक लोगो के बढ़ते कदम से बंद हो गया। इतना ही नही देश की आजादी के लिए हंसते हंसते फांसी के फंदे पर झूलने वाले शहीदो का नाम भी मिटने लगा है। उनकी याद में बना शहीद स्तम्भ टूटने फूटने लगा है। ये वो जांबाज शहीद है जो आजादी का विगुल बजते ही 5 जून 1857 की शाम वाराणसी सीमा पर दर्जनो अंग्रेजो को मौत के घाट उतार दिया था। 
शहर से करीब दस किलोमीटर की दूरी पर स्थित हौज गांव है। इस गांव के 16 लोगो को अंग्रेजो ने सन् 1858 में अंग्रेजी हुकुमत के सुपर वाईजर समेत एक दर्जन अंग्रेज अफसरो की हत्या करने के आरोप में गांव में ही फांसी की सजा दी गयी थी।
जनपद के उक्त गांव के बुजुर्ग चिंता हरण सिंह चौहान ने बताया कि जब सन् 1857 में आजादी का विगुल बजा तो इस गांव के जमींनदार बालदत्त ने युवाओ की एक टोली तैयार कर लिया। पांच जून 1857 को पता चला कि जौनपुर के सभी अंग्रेज अफसर सुपर वाईजर विगुड के नेतृत्व में वाराणसी जा रहे है। बालदत्त अपने करीब एक सौ साथियों के साथ रास्ते में घेरकर सभी को मारने के बाद शव को दफन कर दिया। बाद में कुछ देश के गद्दारो ने झूठी गवाही देकर 15 लोगो को फांसी की सजा करा दिया। उसके बाद बालदत्त को काला पानी की सजा सुनाया गया था। इन शहीदो की उपेक्षा काफी दिनो तक होती रही। 1986 में यहां पर शहीदो के सम्मान में एक स्मारक स्तंभ बनाया गया।
ग्राम प्रधान भृगुनाथा चौहान ने बताया कि पूर्व कैबिनेट मंत्री जगदीश राय के पहल पर इस स्मारक पर हर 15 अगस्त को मेला लगने लगा था। इसमें नेता मंत्री अधिकारी आते थे। शहीदो को नमन करने के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम होता था। लेकिन बाद में इस स्मारक और गांव में होने वाले विकास कार्यो के नाम पर नेताओ का लगने वाले पत्थर को लेकर विवाद होने लगा। इसी गांव के अलग अलग पार्टियो से तालुख रखने वाले लोग एक दूसरे नेताओ का पत्थर उखाड़ फेकने लगे, जिसके कारण मेला लगना बंद हो गया, और अब स्मारक का संगमरमर उखड़ने लगा है। स्मारक पर शहीदो के लिखे गये नाम धूमिल होने लगा है। यही हाल रहा तो अगले बरस तक पूरी तरह से शहीदो का नाम मिट जायेगा।

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